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सर सैयद अहमद खान

सैयद अहमद खान आमतौर पर सर सैयद के रूप में जाने जाते है. वह उन्नीसवीं सदी के भारत के एक एंग्लो इंडियन मुस्लिम दार्शनिक, दंभी और सामाजिक कार्यकर्ता थे.

१८४२ में मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर द्वितीय ने सर सैयद पर जावद-उड़-दौला का ख़िताब प्रदत्त किया, जो १८ वीं सदी के मध्य के आसपास सम्राट शाह आलम द्वितीय ने सर सैयद के दादा सैयद हादी पर प्रदत्त किया था. इसके अलावा, सम्राट ने आरिफ जंग का खिताब भी प्रदत्त किया.

भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के लिए एक विधिवेत्ता के रूप में काम करते हुए, मुगल बड़प्पन में जन्में सर सैयद एक प्रतिष्ठित विद्वान के रूप में ख्याति अर्जित थे. १८५७ के भारतीय विद्रोह के दौरान वह ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति वफादार बने रहे और यूरोपीय जीवन को बचाने में अपने कार्यों के लिए प्रसिद्ध हुए. विद्रोह के बाद, उन्होंने एक पुस्तिका "भारतीय विद्रोह के कारण" लिखी. जो ब्रिटिश राज्य के दौरान, एक साहसी आलोचना की पुस्तक थी, जिसमे ब्रिटिश नीतियों को विद्रोह का कारण बताया था.

सर सैयद ने पश्चिमी शैली के वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई आधुनिक स्कूलों और पत्रिकाओं का स्थापना किया और मुस्लिम उद्यमियों का आयोजन शुरू किया. इस लक्ष्य की दिशा में, सर सैयद भारतीय मुसलमानों के सामाजिक, वैज्ञानिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से १८७५ में, प्रसिद्ध अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (ए.एम.यु) की स्थापना की.

सर सैयद सभी भारतीय मुसलमानों की भाषा के रूप में उर्दू के उपयोग को बढ़ावा दिया, और मुस्लिम नेताओं और उद्यमियों के एक बढ़ती पीढ़ी के उपदेशक बने. हिंदी-उर्दू विवाद से पहले, वह मुसलमानों और हिन्दुओं दोनों की शिक्षा के लिए हितबद्ध थे और इसी समय के दौरान उन्होंने भारत की कल्पना एक सुन्दर दुल्हन की तरह की जिसकी एक आँख हिन्दू और दूसरी मुस्लिम थी.उनके यह दृष्टिकोण के कारण वह वह एक सुधारक और राष्ट्रवादी नेता के रूप में प्रसिद्ध हुए .

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